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कुमारी शैलजा का दो दिवसीय उत्तराखंड दौरा, पार्टी संगठन को मजबूत करने और नेताओं के साथ समन्वय को लेकर कई महत्वपूर्ण बैठकों में लेंगी हिस्सा, राजीव महर्षि I
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सेवारत शिक्षकों के टीईटी अनिवार्यता का शीघ्र होगा समाधान, डाॅ. धन सिंह रावत।
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देहरादून में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की तैयारियां तेज, 19 को मुख्यमंत्री की अगुवाई में होगी ‘रन फॉर योग।
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उप जिला निर्वाचन अधिकारी ने ,विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान की प्रगति समीक्षा की, गणना प्रपत्रों के डिजिटाइजेशन कार्य में तेजी लाने के दिए निर्देश।
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समाधान दिवस’ बना उम्मीद की किरण, गंभीर रूप से बीमार 4 बच्चों का होगा मुफ्त इलाज।
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उत्तराखंड के सीमांत जनपदों में दिखेगी, देश के विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक झलक।
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मुख्यमंत्री ने पौड़ी में डॉ. अंबेडकर जिला विज्ञान संग्रहालय का, लोकार्पण कर दी 110 करोड़ की विकास योजनाओं की दी सौगात।
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श्री महंत इन्दिरेश अस्पताल के, बे्रस्ट कैंसर सर्जन ने महिला को दिया नया जीवन, मरीज़ के स्तन से निकाला 12.5 किलो का टयूमर।
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मोदी का कार्यकाल स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जायेगा,सतपाल महाराज।
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चुनाव से ठीक पहले

चुनाव से ठीक पहले

सीएए को सिर्फ सीमित चुनावी नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। बल्कि यह भाजपा की वैचारिक परियोजना का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसके जरिए भारतीय नागरिकता को तय करने वाली कसौटियों में अब धर्म एक पहलू बन गया है। केंद्र सरकार ने नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) को लागू कर दिया है। इसके लिए जरूरी नियम जारी कर दिए गए हैँ। जाहिर है, ये कदम 18वें आम चुनाव से ठीक पहले उठाया गया है। खबरों के मुताबिक हफ्ते भर के अंदर चुनाव कार्यक्रम की घोषणा होने वाली है। उस पृष्ठभूमि में इसे सरकार और सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के एक चुनावी कदम के रूप में देखा जा सकता है। महजबी आधार पर ध्रुवीकरण भाजपा की एक प्रमुख राजनीतिक ताकत है।

अगर चार साल पहले की घटनाओं पर- जब सीएए पारित हुआ था- गौर करें, तो तब इस कानून के खिलाफ एक बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसमें मुस्लिम समुदाय ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। उसी सिलसिले में दिल्ली में दंगा भी हुआ। इससे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को हवा मिली थी। कानून लागू होने के साथ उन सारी घटनाएं की याद ताजा हो सकती है। इसके अलावा अगर फिर से इस कानून का विरोध हुआ, तो ऐसा माहौल और अधिक गरमा सकता है। बहरहाल, इस कानून को सिर्फ इस सीमित नजरिए से देखना उचित नहीं होगा। बल्कि यह भाजपा की वैचारिक परियोजना का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

इसके जरिए भारतीय नागरिकता को तय करने वाली कसौटियों में अब धर्म एक पहलू बन गया है। इस कानून के तहत अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत आने वाले गैर-मुस्लिम व्यक्ति भारतीय नागरिकता के लिए अर्जी दे सकेंगे। इस तरह मजहब नागरिकता तय करने की एक कसौटी बन जाएगा। समझा जा सकता है कि यही व्यवस्था करना इस कानून का मुख्य मकसद है।

वरना, अगर उद्देश्य पड़ोसी देशों में उत्पीडि़त व्यक्तियों को राहत देना होता, तो फिर इस कानून के दायरे में श्रीलंका और म्यांमार को भी शामिल किया जाता- जहां अधिकतर उत्पीडि़त व्यक्ति हिंदू धर्म को मानने वाले होते हैं। जाहिर है, कानून उत्पीडि़त शरणार्थियों को राहत देने के लिए नहीं, बल्कि भारतीय राज्य के मूलभूत स्वरूप में परिवर्तन के लिए बनाया गया है। भाजपा का हमेशा से यह एक वैचारिक उद्देश्य रहा है। इस बीच चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने इसके खिलाफ दायरे याचिकाओं को लटका रखा है, इसलिए सरकार के इस ओर बढऩे का मार्ग प्रशस्त हो गया है।

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